Monday, 31 March 2025

E.M.P.U.R.A.A.N and Mohanlal - Unwatchable. I Want My Money Back

 


Watched the latest Mohanlal-starrer Malayalam movie EMPURAAN, with English subtitles. Some dialogues were is Hindi and English for which subtitles were in Malayalam.

Created with a lot of negativity the movie casts Hindus as mass murderers, cruel bigots, and unrepentant butchers. The opening scene, without saying so, is an exxagerated depiction of Gujarat riots of 2002. What it conveniently brushes aside by displaying that single  location, though lengthy scene of gore, blood, rape, and massacre, is that Hindus too were killed in large numbers (700 of them) in the same Gujarat riots let alone those, who were burnt alive in a train. It also ignores the fact that hundreds have been tried and jailed for those heinous acts of 2002. Perampuraan opens up old, forgotten wounds for reasons beyond the box office, it wants to create a new narrative. It portrays that a sense of revenge has festered for a whole generation. It might well have but the film has stoked the dying embers so crassly and shows that a victim boy, whose family were killed, grows up and becomes an international mercenary eventually descending in Kerala to slay the perpetrator, Bajrangi, in an equally gruesome way.

To fire up the imagination of the audience the grieving Muslim boy, when asked by Mohanlal, the flamboyantly named Lucifer, the anti-Christ yet the son of a sober Christian priest, what he wants most, he says, “BADLA”, in Hindi, so that the healing sense of victimhood raises its head once again and resonates across the land - North, East, West, and South. Upon that Mohanlal says, again in Hindi/Urdu for universal acceptance, “Sahi bola. Rahmat se Allah khush hota hai, Badle se insaan.” Wow! Gandhi Ji must be shedding copious tears in the heaven.

The cleverly named Bajrangi is a Hindu fanatic and viewers are nudged to compare him with the benign Bajrangi Bhaijaan recently played by Salman Khan. Not to leave anything to imagination, the grown up Muslim boy, who is now a semi-Superman (the full Superman is Mohanlal, of course), says in the last scene - Bajrangi is mine, Bhaijaan! You can take the rest.

The movie takes you to Yemen, London, Pakistan, Afghanistan, even a deserted oil-rig, with Mohanlal and his protege traveling seamlessly across international borders. He kills the British, Russians, Africans, and Indians in a drug-and-diamonds war yet he is called upon, via a YouTube video, by conscientious Keralites, to come back and save the peaceful Kerala from a selfish dynastic CM, son of a benign but dead former CM. The rogue CM has sought help from the same Bajrangi, the mass murderer from the North (West?), to form a new party and perpetuate his rule in an imagination-gone-wild political plot. That the dynastic rogue CM must be replaced by the dynastic daughter of the same dead CM is rather easy on the conscience of the storyteller.

If M/S Antony Perumbavoor, Prithviraj Sukumaran, Murali Gopy etc. wanted to present a counter to the largely-true Kerala Story of Vivek Agnihotri, they have miserably failed cinematographically. They have, on the other hand aggravated the sense of victimhood among Muslims and tainted the largely tolerant and peaceful Hindus blackest of black, and widened the chasm that may take years to fill. The suggestion that Muslims and Christian, together, are pitched against malicious Hindus is creation of a new of divide in the peaceful society that prides itself in calling its state God’s Own Country. The film makers have effectively created distinct children of three Gods, two pitched agains the third.

I don’t know how such a divisive film was cleared by the Censor Board. The movie Empuraan should be banned forthwith and the entire Censor Board sacked.

Shame on you, Mohanlal!

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Sunday, 23 March 2025

बैताल-पच्चीसी - आज का बैताल कौन?

 


बचपन में चंदामामा बाल-पत्रिका में विक्रम और बैताल की कहानियाँ आपने भी पढ़ी होंगी। हर कथा में महाराजा विक्रमादित्य की पीठ पर बैठा बैताल एक नई कहानी सुनाता है। फिर उससे राजा के विवेक को चुनौती देता हुआ एक प्रश्न पूछता है। हर कहानी में एक क्लिष्ट कथानक होता था, जिसका कोई सीधा समाधान हम बच्चों को नहीं सूझता था। पर बैताल का प्रश्न तो राजा के लिये होता था, कि चंदामामा के बाल-पाठकों के लिये।

 

प्रश्न के बाद एक चेतावनी भी होती थी, हे राजन्, यदि तुमने जानते हुए भी मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया, तो तुम्हारे सिर के हज़ार टुकड़े हो जाएँगे। राजा हर बार एक समुचित उत्तर देता, पर उसके मौन तोड़ने के कारण बैताल उड़कर फिर पेड़ पर जा लटकता। राजा फिर अगली रात बैताल को ढोने के लिये बाध्य हो जाता था, फिर एक कठिन प्रश्न का उत्तर देने के लिये।

 

दशकों बाद आज समझ आया कि बैताल राजा विक्रमादित्य को ट्रेनिंग दिया करता था राजोचित चिंतन करने और न्याय-अन्याय का भेद समझने में। ट्रेनिंग इस बात की भी होती थी कि राजधर्म के अनुसार राजा के लिये सही बात बोलना आवश्यक है। राजा सबकुछ जानते हुए चुप नहीं रह सकता। विक्रमादित्य के उत्तर अक्सर हम बच्चों की समझ से परे होते थे। अब यदि मैं विक्रम और बैताल की कहानियाँ दुबारा पढ़ूँ तो शायद बैताल की जटिल कहानियों, उसके कठिन प्रश्नों, और विक्रमादित्य के विद्वतापूर्ण उत्तरों का सार बेहतर समझ में आए।

 

पुराने जमाने में राजा में ही समस्त शक्तियां निहित होती थीं - वही शासक, वही न्यायाधीश, वही क़ानून-व्यवस्था और आंतरिक सौहार्द्र और शांति का रखवाला, और वही सेना का प्रधान सेनानायक होता था। आज ये दायित्व बॉंट दिये गए हैं और हर एक क्षेत्र का अलग रखवाला बना दिया गया है। पर क्या हर विभाग-प्रमुख को अपने-अपने कार्यक्षेत्र के लिए बराबर का और पूर्ण जवाबदेह भी बना दिया गया है, या उनकी नाकामी और बेइमानी का प्रतिफल बेचारा राज्य का प्रधान ही सहता है, हर पॉंच वर्ष में?

 

अतः हे जागरूक नागरिक, हे प्रबुद्ध पत्रकार, हे समाज के सहज नेता, जागो! बैताल बनो। जो भी विक्रमादित्य तुम्हें नज़र आता है, जिससे भी तुम प्रश्न करना चाहते हो, जो जानते हुए भी तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर नहीं देना चाहता, उससे बार-बार प्रश्न करो। शायद तुम्हारे प्रश्नों से प्रमादी के सिर के हज़ार टुकड़े हो जाएँ।

 

तो चलो, दिल्ली दमकल विभाग, पुलिस विभाग, आयकर विभाग, और न्यायपालिका से शुरु करते हैं। विक्रम और बैताल की कहानियाँ तो बैताल-पच्चीसी तक ही रुक गई थीं। हमें शायद बैताल-हजारी तक जाना पड़े। थकना नहीं, रुकना नहीं। 

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Thursday, 30 January 2025

आजकल लोग सोसाइटियों में रहते हैं


आजकल लोग सोसाइटियों में रहते हैं। हमें समाजशास्त्र की कक्षा में गलत पढ़ाया गया था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मनुष्य सामाजिक प्राणी अब हुआ है, पहले तो मनुष्यों के छिटपुट झुंड इधर-उधर गुफाओं में रहते थे। एक गुफा में बीस-तीस व्यक्ति हुआ करते थे। दूसरी गुफा कोसों दूर होती थी। पहली गुफा वालों को दूसरी बस्ती की कोई ख़बर नहीं। हो भी तो कैसे - टेलिफोन, चिट्ठी-पत्री, चौपाल-दालान, और ना ही किटी-पार्टी की गप्प और परनिंदा की साप्ताहिक बैठकें। कभी-कभार एक ही जानवर का शिकार करते दो झुंडों में टकराव हो जाता तो भाला या पत्थर मार कर वापस अपनी-अपनी गुफा में जा छिपते थे। ऐसे कहीं समाज का निर्माण होता है भला?

 

समाज तो अब बना है और मानव अब कहीं हुआ है सामाजिक प्राणी। आपने सुना ही होगा - त्रिभुवन सोसाइटी, गैलेक्सी अपार्टमेंट रेजिडेंट्स सोसाइटी, डीएलएफ डायमंड सोसाइटी, इत्यादि। ये आजकल की गुफाओं के नाम हैं। आमतौर पर हर सोसाइटी में सौ से लेकर हज़ार तक लोग रहते हैं। हर सोसाइटी एक क्लोज़-ग्रुप होती है और लोग एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं सिवाय गुरु शरणम् सोसाइटी वालों के। जैसे हर गुफा में मुखिया, पहरेदार इत्यादि होते थे, वैसे ही सोसाइटियों में सेक्रेटरी, सिक्योरिटी गार्ड और ट्रेजरर होते हैं। जब कोई निवासी नया सेक्रेटरी बनना चाहता है तब सोसाइटी के सदस्य प्राचीन गुफावासियों की ही तरह ही मार-पीट और सिर-फुटौवल करते हैं, जिस प्रक्रिया को आजकल सोसाइटी-इलेक्शन कहा गया है।

 

आजकल पंचांग और कैलेंडर तय नहीं करते कि होली कब होगी, या दीवाली कब मनाई जाएगी। सोसाइटी की मैनेजिंग कमिटी बैठकर त्योहारों की तारीख़ें तय करती हैं। एकबार तो मेरी सोसाइटी में होली मन रही थी और बगल वाले में कोई सामूहिक हवन चल रहा था। पूछने पर पता चला कि उनके सेक्रेटरी की पत्नी की टाँग टूट गई है और वे लोग अब मैडम का पलस्तर खुलने के बाद अगले महीने होली खेलेंगे। हवन उनकी टाँग जल्दी ठीक हो जाए इसके लिये किया जा रहा था। ये होती है समाजिक सोच और ऐसे होते हैं सामाजिक प्राणी। ऐसे बाँटे जाते हैं सुख-दुख। दूर-दूर गुफाओं और मकानों में रहने से आदमी सामाजिक प्राणी नहीं बन जाता। कुछ सोसाइटियॉं बन तो जाती हैं, पर उसके निवासी सामाजिक नहीं बन पाते। अब गुरु शरणम् सोसाइटी को ही ले लें। एक भले आदमी को किसी चोर-उचक्के ने छुरा मार दिया, पर उस ग़रीब की मदद को कोई नहीं आया, यहाँ तक की अपनी पत्नी भी नहीं। बेचारे के मासूम उम्र के पुत्र ने आधी रात को टांग-टूंग कर रिक्शे से उसे अस्पताल पहुँचाया। ऐसी सोसाइटी बनने का क्या लाभ? प्राचीन काल में जब गुफावासी मनुष्य सामाजिक प्राणी नहीं था तब भी यदि कोई भेड़िया या तेंदुआ गुफा में ताक-झाँक करता दिख जाता तो सब मिलकर हुर्र-हुर्र करके खतरे का निवारण तो कर लेते थे।

 

मानव को सामाजिक प्राणी बनाने में बिल्डरों और डेवलपरों के योगदान को अभी तक मानवशास्त्रियों ने कोई महत्व नहीं दिया है। कुछ बिल्डर तो ऐसे पुण्यात्मा होते हैं कि दस-मंजिली बिल्डिंग की अनुमति पर पंद्रह से बीस मंजिलें तक बना डालते हैं ताकि अधिक से अधिक गुफावासियों को सामाजिक बनाया जा सके। आज इतना ही। मैं चलता हूँ क्योंकि मेरी सोसाइटी की मीटिंग है। हमारे सेक्रेटरी के कुत्ते को बगल वाली सोसाइटी के सिक्यूरिटीगार्ड ने कल डंडे से पीट दिया था। अब दोनों सोसाइटियों में युद्ध होगा। सेना बनाई जा रही है। मुझे भी हॉकी-स्टिक लेकर पहुँचना है, अपनी सोसाइटी की इज़्ज़त का सवाल जो है।

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