Friday, 9 October 2026

वाईन सूँघने की नौटंकी

 


आपने पाँच-सितारा होटलों और महँगे रेस्तराँओं में बग़ल के टेबुल पर बैठे अक्सर ऐसे शौक़ीन देखे होंगे जो मदिरापान की कला का अद्भुत प्रदर्शन करते हैं। असल में पीने की नहीं, सिर्फ़ चुनने या चखने की। बेयरा, आप चाहें तो सोमेलियर कह लें, शराब वाला मेन्यू पेश करता है, और ग्राहक की वेष-भूषा या चाल ढाल देख कर, वाईन वाला या बीयर वाला पन्ना खोल देता है। मुझे तो हमेशा बीयर वाला पन्ना ही दिखाया गया है।

 

अब जैसे ही वे संभ्रांत सज्जन — वैसे संभ्रांत लोग अक्सर सज्जन ही होते हैं — वाईन की लिस्ट पर उँगली फिराते हैं, तब वही निम्न मध्यवर्गीय बेयरा साहब की औक़ात नाप रहा होता है। खैर, साहब एकाध-दो बार लिस्ट पर अपनी उँगली ऊपर-नीचे करके जब फ़्रांस के गाँव-मुहल्लों के लंबे अपठनीय और नितांत अनुच्चरणीय नामों के प्रति ख़ानदानी वाक्फियत दिखा रहे होते हैं, तब बेयरा भी अपनी मुंडी उसी तारतम्य में हिला रहा होता है।


फिर संभ्रांत ग्राहक महोदय, अपनी महिला मित्र को प्रभावित करने के उपक्रम में, बोल उठते हैं - डार्लिंग, आई थिंक यू विल लव दिस, और चुनी गई शराब के नाम पर उँगली टिका देते हैं। संभ्रांत महिला मित्र, पहले क़ीमत देखती हैं, फिर बड़ी संजीदगी  से, पर अनुमोदन के साथ हौले से मुस्कराती हैं, और बोलती हैं - येस, दैट वुड बी परफ़ेक्ट।


ग़ौर करने की बात यह है कि दोनों में से किसी ने अबतक चयनित आसव का नाम नहीं लिया है। 

 

साहब बड़े स्टाइल से सिर थोड़ा टेढा करते हैं और बाक़ी की दिशा अपनी तिरछी नज़र से तय करते हैं। उँगली को ज़ोर से वाईन के नाम पर दबाये हुए — कहीं खिसक ना जाये और फिर शायद फ़्रांस का वह मुहल्ला दुबारा खोजने पर भी नहीं मिले, वेटर से पूछते हैं - वुड यू हैव दिस?

 

वेटर ज़ोर से सर हिलाता है और बोल पड़ता है - येस सर, एक्सेलेंट च्वायस, सर। बोरगॉन ये पॉ टू ग्रॉं। वी हैव जस्ट द राईट ब्रू फ़ॉर यू एंड मादाम, फ्रॉम टू थाउजैंड ट्वेंटी थ्री। मैडम नहीं, मादाम बोलकर वेटर ने सिद्ध कर दिया कि वह कागज़ी बादाम और चिनियाबादाम में फ़र्क़ करना जानता है।


साहब ने फ़्रांस के इस मुहल्ले का नाम पहली बार सुना, जिसका उच्चारण लिखे हुए नाम से दूर-दूर तक मेल नहीं खाता। सुनकर मनस्थ करने की कोशिश की, पर सफल नहीं हुए। कम्बख़्त वेटर ने भी एक ही बार बोलकर इतिश्री जो कर ली थी। खैर, अगली बार कौन सी यही वाईन पीनी है, यह सोचकर बात नज़रअंदाज़ कर दी।


असली लानत तो फ़्रांस को भेजी - नामाकूल लोग! हर गाँव-क़स्बे में शराब पकाने का कारख़ाना खोल रखा है, मानों कोई ग्रामोद्योग हो, जैसी कल्पना गांधी जी ने चरखा और हस्तकरघा को लेकर की थी। अरे ऐसा करना ही था तो सीधे-सादे नाम रखते, जैसे रामपुर, टीकमगढ़, या भीमअखाड़ा। पर नहीं, ये तो रखेंगे अगड़मबगड़मचकरमफूँफॉं।


देखिये मुझे भी नाम याद हो गया। अगली बार सर्वना भवन में डिमांड करके वेटर बालाकृष्णन को अचंभित कर दूँगा, पर वह लायेगा परुप्पु रसम फ्रॉम वेंकटनरसिंहराजूवारीपेटा ही।

 

चलिये आगे की कहानी सुनाता हूँ।


सोमेलियर भाई बड़ी नज़ाकत से एक शराब की बोतल स्वच्छ-श्वेत नैपकिन में लपेट कर लाए। फिर ज़रा सा उघाड़कर बोतल का लेबल संभ्रांत ग्राहक को ठीक वैसे ही दिखाया, जैसे अस्पताल में नर्स किसी नवजात शिशु का चेहरा उत्सुक माँ को पहली बार दिखाती है।


साहब ने बिल्ले पर थोड़ी हिकारत और थोड़े मूल्यांकन की नज़र पलभर को डाली और सिर बस इतना हिलाया जितना सूरत का जवाहरात-व्यापारी पाँच कैरेट के त्रुटिहीन और बेशक़ीमती हीरे को देखकर हिलाता है। आख़िर अठारह हज़ार रुपये की बोतल जो थी।

 

अनुमोदन मिलते ही दस्ताने-युक्त हाथों से वेटर बोतल का कॉर्क एक ख़ास यंत्र से खोलता है। फिर एक लंबी डंडी वाले गिलास को बायें हाथ में लेकर, दूसरे हाथ से जरा-सी मदिरा ढालता है, और साहब को पकड़ाता है।


साहब भी उसी नज़ाकत से गिलास की डंडी पकड़ते हैं, फिर गिलास को गोल-गोल घुमाते हैं, और नासिका के पास लाकर सूंघने का सा कुछ अभिनय करते हैं। फिर महिला मित्र की ओर देखते हैं, और गंभीर स्वर में बोल पड़ते हैं - हूँ,,, या अंग्रेज़ी में कहें तो हम्म्म्म!

 

दम साधे बेयरा आख़िर गहरी साँस छोड़ता है, और दो गिलासों में शराब ढाल कर दोनों मेहमानों को परोस देता है।


कभी आपने सोचा है कि यदि वह संभ्रांत मेहमान शराब सूँघकर अनुमोदन की बजाय नाक सिकोड़ कर बोल देते, “नॉट गुड इनफ” तो क्या होता? अठारह हज़ार की बोतल क्या नाली में उँड़ेल दी जाती, या फिर साहब का कॉलर पकड़कर उसके हलक में उतार दी जाती - स्साले, तुझे फ़्रेंच वाईन पहचानने का भी शऊर है, जो रिजेक्ट कर रहा है? अबे जेंटलमैन की औलाद, चुपचाप पी कर बिल भर, और दुबारा यहाँ मुँह मत दिखाना।

 

मैंने तो आज तक किसी को खुली बोतल की शराब रिजेक्ट करते नहीं देखा है। फिर इतनी नौटंकी क्यों होती है, भाई! जब आठ लाख की फ़र्स्ट-क्लास अंतर्राष्ट्रीय विमान यात्रा में जो भी दारू मिलती है वही गटक लेते हैं, तो होटलों में यह हास्य-एकांकी क्यों खेली जाती है? 

 

अब चूँकि इन महँगे प्रतिष्ठानों ने मुझे बीयर के अलावा और किसी लायक़ नहीं समझा, तो कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि जब मुझे बीयर परोसी जाये, तो मैं बेयरे को बोलूँ, “बरखुरदार, पहले गिलास में डाल कर सुँघाओ तो सही!”


फिर जब वो ऐसा करे तो बोलूँ, “ये क्या बडवाईजर लाईट उठा लाया है, हेवार्ड फाईव थाउजैंड नहीं है क्या?”

 

आपको क्या लगता है? क्या मुझे डाँटकर भगा देंगे, या बर्तन धोने पर लगा देंगे?

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