(आसन्न राजभाषा सप्ताह के उपलक्ष्य में)
बात सन् ‘86 की है। आज़ादी के चालीस वर्ष नहीं हुए थे। आज अस्सी होने को आए। तब भी सरकारी महकमों में राजभाषा का प्रचार-प्रसार होता था, आज भी होता है, और आगे भी होता रहेगा। राजभाषा एक प्रकार की सरलीकृत हिंदी है, जिससे कार्यालयी कामकाज साहित्यिक हिंदी के मुक़ाबले आसान हो जाता है। पर कुछ राज्य-सरकारों को छोड़कर अन्य दफ़्तरों में आज भी अंग्रेज़ी का ही बोलबाला है। कई बार ऐसे प्रस्ताव बने कि क्यों न केंद्र सरकार के कार्यालयों से अंग्रेज़ी टाईपराईटर और अंग्रेज़ी आशुलिपिकों को ही हटा दिया जाए - न रहेगा बाँस, न रहेगी बाँसुरी। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, ऊपर से पर्सनल कम्प्यूटर और आ गये और अंग्रेज़ी ने गहरी जड़ें जमा ली। अब हिंदी में कोई पावरप्वायंट प्रेजेंटेशन बनाता है भला?
खैर, सन् ‘86 में चलते हैं। मैं रेलवे स्टाफ़ कॉलेज, वडोदरा, में फ़ाऊंडेशन कोर्स कर रहा था। पाठ्यक्रम में रेलवे की विभिन्न सेवाओं के लगभग चालीस प्रोबेशनरी अधिकारी थे। तीन महीने की अवधि में सोलह अलग-अलग विषयों की पढ़ाई होनी थी - तकनीकी और ग़ैर-तकनीकी। अंत में इन विषयों की परीक्षा भी निर्धारित थी। एक दिन संस्थान के राजभाषा अधिकारी, चतुर्वेदी जी, की कक्षा थी। उन्होंने राजभाषा के नियम-विनियम समझाए और फिर बताया कि यदि आप प्रोबेशनर लोग कम-से-कम पाँच विषयों की परीक्षा राजभाषा में देंगे तो आपको पाँच सौ रुपये का नगद ईनाम मिलेगा। (मैंने मन ही मन कहा - नाऊ, नाऊ सर, यू डोंट चैलेंज अ नेतरहाटियन इन मैटर्स ऑफ़ हिंदी।) पर प्रकट तौर पर हिंदी में मैंने पूछा कि यदि सभी प्रश्नपत्रों के उत्तर हिंदी में लिखूँ तो कितना ईनाम मिलेगा? राजभाषा अधिकारी महोदय घबरा गये। बोले, “नहीं-नहीं, इसकी कोई आवश्यकता नहीं। आपको पाँच विषयों के उत्तर लिखने पर ही ईनाम मिल जायेगा।”
बात आई-गई हो गई। परीक्षा के दिन आ गये। मैंने पाँच विषयों के प्रश्नपत्रों के उत्तर हिंदी में लिख दिये। फिर छह, सात, आठ हो गये … संख्या बढ़ती ही गई। सूचना मिलने पर चतुर्वेदी जी परीक्षा हॉल में आ गये और मेरे बग़ल में खड़े होकर हौले से बोले, “शुभ्रांशु जी, आपका ईनाम सुनिश्चित है। अब बस कीजिये, कहीं ऐसा न हो कि इस उत्साह में आप फ़ेल हो जाएँ।फ़ेल होने पर ये पाँच सौ भी नहीं मिलेंगे।” मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि मैं फ़ेल नहीं करूँगा, और वैसे भी मैं ईनाम के लालच में हिंदी में नहीं लिख रहा हूँ।
पर राजभाषा अधिकारी की परेशानी दूर नहीं हुई। यदि मैं हिंदी में लिखकर फ़ेल हो जाता तो कहीं राजभाषा की अपूर्णता ना सिद्ध हो जाए, शायद ऐसी कोई चिंता उनके मन में रही होगी। फिर उन्होंने मेरे पाठ्यक्रम निदेशक को सूचित किया कि ये लड़का आत्महत्या करने पर तुला है, इसे रोका जाये। कोर्स डायरेक्टर साहब, पीसी शर्मा जी, आईआरटीएस, शाम को होस्टल में मेरे कमरे में आ गये और बोले कि ज़्यादा उत्साह मत दिखाओ, कहीं लेने के देने ना पड़ जाएँ। मैं कक्षा के अच्छे छात्रों में था। उनकी चिंता भी स्वाभाविक थी कि कोई अच्छा छात्र फ़ेल नहीं होना चाहिये। मैंने उन्हें भी विश्वास दिलाया कि मैं फ़ेल नहीं होऊँगा।
परीक्षाएँ ख़त्म हुईं और दो-तीन दिनों में रिज़ल्ट भी आ गये। मैं पूरी कक्षा में प्रथम आया और प्रिंसिपल पदक का भागी बना। पर ऐसा नहीं भी हो सकता था क्योंकि सभी सहपाठी कमोबेश बराबर ही थे। पर संयोगवश ही सही, यह तो सिद्ध हो गया कि हिंदी, या राजभाषा, अंग्रेज़ी से कमतर नहीं, विषय चाहे तकनीकी हो या ग़ैर-तकनीकी। चतुर्वेदी जी ने मुझे बुलाया। मेरे पहुँचते ही खड़े गये। बोले कि मैंने आपको कम आँका, फिर चाय पिलाई। उन्होंने रेल राजभाषा पत्रिका में यह उपलब्धि मेरी तस्वीर के साथ छपवाई। शायद अपने एसीआर में भी अपनी उपलब्धि के तौर पर लिखा होगा। बाद के वर्षों में कई प्रोबेशनरों ने ऐसा ही किया और उनमें से कुछ प्रथम भी आये।
कालांतर में मेरे एक बॉस ने मेरी एसीआर ख़राब करने की ठानी। अब चूँकि काम और उपलब्धियों पर कुछ उल्टा लिखना संभव नहीं था, इसलिये उन्होंने लिखा, “ही डजंट यूज़ राजभाषा।” अब सुनने में तो कोई बड़ी निगेटिव बात नहीं लगती, पर ग्रहदशा ख़राब हो तो इस टिप्पणी का करियर में नुक़सान करने के लिये पुरज़ोर इस्तेमाल किया जा सकता था। सो मेरे बॉस के बॉस ने बुलाकर मुझे एसीआर दिखाई और पूछा कि मैं इसका क्या करूँ? मैंने कहा कि सर, चाहे मैं अपने काम में निकम्मा रहा होऊँ, पर राजभाषा को लेकर यह टिप्पणी मुझे मंज़ूर नहीं। मैंने रेल राजभाषा का वो पन्ना भी दिखाया, जो ऊपर दिया है। बॉस के बॉस हँसे और बोले कि तुम्हारे बॉस को असल में तुम्हारी अंग्रेज़ी से समस्या है। मेरे बॉस साहब का अंग्रेज़ी में हाथ तंग था और मेरी अंग्रेज़ी से चिढ़ते थे और सभाओं में ऐसा दिखाते भी थे। सो मामला आउटस्टैंडिंग पर जाकर रुका।
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