आपने बाथरूम से निकलती अपने लंबे गीले बालों पर तौलिया लपेटे सुंदरियों के चित्र और वीडियो ज़रूर देखे होंगे। सौंदर्य से हतप्रभ आप यह भी ज़रूर भूल गये होंगे कि विज्ञापन शैंपू का था, तौलिये का, या वैवाहिक कुंडलियाँ मिलाने वाली एजेंसी का। नवयौवना की ख़ुशी विज्ञापन की फीस के सापेक्ष होती है। पर उसके उलट आपने देखा होगा कि जब अस्पताल में नर्स तौलिये में लपेटे नवजात शिशु को उसकी माँ को सौंपती है तो प्रसव से निकली माँ के चेहरे पर कैसा वात्सल्यपूर्ण आह्लाद निखर आता है, जो कि सर्वथा निश्छल और नैसर्गिक होता है।
जब सरकार नया अफ़सर भर्ती करती है, तो वैसे ही यूपीएससी बड़ी नाजुकता से एक-एक अधिकारी को तौलिये में लपेटकर सरकार की गोद में डाल देती है - हमारा काम ख़त्म हुआ, अब आप इस आधिकारिक शिशु का ज़िम्मा सँभालें, और जो बन सकता है कर लें। फिर जैसे महारथी कर्ण का कवच-कुंडल उसकी वय एवं काया के साथ बढ़ता गया था, वह यूपीएससी का तौलिया भी साहब के पद एवं महत्व के साथ ही बढ़ता जाता है और फिर साहब की कुर्सी के पीछे जम जाता है। आपने सरकारी दफ़्तरों में अफ़सरों की कुर्सी के पीछे श्वेत तौलिये लिपटे पाए होंगे। कई लोग तो ऐसी ग़लतफ़हमी पाल लेते हैं कि साहब के आचरण एवं क्रियाकलाप भी वैसे ही स्वच्छ होते होंगे। ऐसे आमलोग मोहभंग होनेपर दु:ख को प्राप्त होते हैं।
जब मैं भी अधिकारी बना तो मेरा चपरासी ऐसा ही लंबा-चौड़ा तौलिया लेकर सामने खड़ा हो गया और बोला, “सर, उठिये।” मैंने कहा कि मैं तो घर से नहाकर आया हूँ, फिर क्यों नहाऊँ? चपरासी ने मुँह पर हथेली रखी और हँसी रोककर बोला कि सर ये तौलिया नहाने के लिये नहीं, कुर्सी पर लगाने के लिये है। बिल्कुल स्नानागार के लिये उपयुक्त साईज़ का तौलिया था, इसलिये मेरी आपत्ति बिल्कुल वाजिब थी। मैंने कहा कि ये सब चोंचले मुझे पसंद नहीं, मुझे तो हाथ-मुँह पोंछने के लिये कोई छोटा तौलिया ले आओ। अच्छी ख़ासी रेक्सीन मढ़ी कुर्सी पर तौलिया क्यों लगाना? चपरासी भौंचक्का रह गया। बाद में मैंने सुना कि वह अपने सहकर्मियों को कह रहा था कि लगता है कि साहब नक़ल करके पास हुआ है, ज़रा भी साहबियत के गुण नहीं हैं इसके अंदर।
थोड़ी देर में मेरा निजी सचिव आया। मेरी तौलियाविहीन कुर्सी को देखकर मुझसे बोलने लगा कि लगता है कि नये साहब अबतक नहीं आये, जबकि मैं कुर्सी पर ही बैठा हुआ था। उसने मुझसे कहा, “अच्छा हुआ तुम आ गये, कुर्सी को ठीक-ठाक जाँच लो, साहब आते ही होंगे।” तभी चपरासी चाय लेकर हाज़िर हुआ, “सर, चाय।” निजी सचिव जैसे नींद से जागा, “सर, क्या आप ही सर हैं?” मैंने सिर हिलाया, तो बोला, “पर, सर आपकी कुर्सी पर तो तौलिया है ही नहीं! आप सर कैसे हो सकते हैं?” तभी चपरासी उसके कान में कुछ बुदबुदाया जिसमें से इनएक्स्पीरियंस और अहमक जैसे कुछ शब्द उड़कर मेरे कानों में भी पड़े। मैंने इग्नोर करने में ही भलाई समझी।
फिर मैंने सोचा कि अपनी इस तौलिया मुक्ति क्रांति की सफ़ाई देना ज़रूरी है। दफ़्तर के सभी कर्मचारियों को बुला कर मैंने कहा कि देखो मैं तौलिये में बँधकर रहने वाला अधिकारी नहीं हूँ। मैं स्वच्छंदता से काम करने वाला आदमी हूँ चाहे मुझे तौलिये के बाहर भी हाथ-पाँव क्यों न फैलाना पड़े। जिसने मुझे तौलिये के साईज़ में बाँधने की कोशिश की, उसकी खैर नहीं। सारे कर्मचारी इधर-उधर झाँकने लगे। उन्होंने कभी भी बिना तौलिये का साहब जो नहीं देखा था।
बाद में बड़ेबाबू ने बताया कि कालूराम चपरासी ने तौलियों का ग़बन शुरु कर दिया है। हर साल जो तौलिये मेरे नाम से निर्गत होते हैं, कम्बख़्त अपने घर ले जाता है। सुना है कि अपने बरामदे पर रोज़ कुर्सी लगा लेता है, उसपर तौलिया लपेटकर बैठ जाता है और आने-जाने वालों पर रौब गाँठता है। आम जनता का क्या? जहाँ कुर्सी पर लिपटा तौलिया दिखा वहीं सलाम बजाने लगते हैं। आज़ादी के आठ दशकों में तौलिये का महात्म्य बढ़ा ही है, कम नहीं हुआ।
थोड़ा सीनियर होने पर रेक्सीन की जगह फॉ-लेदर ने ले ली। फॉ यानी नक़ली, पर अंग्रेज़ी में बोलने पर बिल्कुल असली का एहसास होता है। थोड़ा और सीनियर होने पर असली लेदर मंडित कुर्सी मिली, ब्रीदिंग अपहोल्स्ट्री। अब कहीं ऐसी कुर्सी पर भी कोई तौलिया लपेटता है भला?
अब, रिटायरमेंट के बाद मैं और मेरी कुर्सी अक्सर ये बातें करते हैं, अगर हमारे बीच तौलिया होता तो क्या होता …
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रोचक बिल्कुल आपके पर्सनालिटी की तरह!!
ReplyDeleteBeautifully narrated.Tauliye ki katha sateek hai.
ReplyDeletewilson ka penset bhi milta tha. ek brief case VIP wala saath mein. uski kahani bhi rochak ho saqti hai.
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