Tuesday, 8 September 2015

कंघी की दुकान

 


एक हमारे मित्र हैं हुनरमंद गुणवान

खोले, बैठे चला रहे कंघी की दूकान

कंघी की दूकान, कहें तो खूब चल रही

आमदनी का दूजा जरिया, खूब कट रही


मैंने पूछा, मित्रवर! क्यों कंघी व्यौपार?

इतनी सारी कंघियाँ कहाँ से लाये यार?

बोले गज़ब जवानी थी, बाल घने थे खूब

अब विलुप्त हैं जैसे गायब बरगद नीचे दूब

बक्से-बक्से भरे पड़े हैं कंघी के श्रीमान

अगले हफ्ते खोल रहा हूँ शैम्पू की दूकान।


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