कुछ समय से मैंने दिनचर्या बदल ली है। पहले सात-साढ़े-सात बजे उठता था, फिर चाय-बिस्कुट के साथ अख़बार का आनंद लेता था। एकाध घंटा इसी में निकल जाता था। फिर तैयार होकर दफ्तर जाता, और थक हार कर लौटता - एक उदास-सी ज़िंदगी कट रही थी। अब रोज़ ब्रह्म-मुहूर्त्त में ही उठकर सबसे पहले आउटहाऊस का चक्कर लगाता हूँ। बेचारे सेवक गहरी नींद में होते हैं, पर मैं खिड़की से ही मुआयना कर लेता हूँ। फिर रात्रि में सोने के पहले भी एक राउँड लगा आता हूँ कि शायद कभी एकाध नोटों की बोरी रखी मिल जाए। कुछ समय पहले एक महानुभाव के यहाँ जब से नोटों की बोरियाँ मिलीं थीं, मेरी उम्मीदों को जैसे पर लग गये थे। जीवन में एक रोमांच भर गया था। पर क्या आम-आदमी की क़िस्मत पाई है मैंने – बोरी तो दूर, एक अदद नोटों का बटुआ भी कभी नहीं मिला।
अलबत्ता मेरी इस अचानक बदली दिनचर्या से श्रीमती जी को कुछ खटका ज़रूर हुआ। एक दिन पूछ ही बैठीं, “क्योंजी, आजकल क्या हो रहा है? तुम्हारे जैसा आलसी आदमी इतना चुस्त-चौबंद कैसे हो गया? मैंने सुबह की हवाखोरी और आफ्टर डिनर वॉक का हवाला देकर बात बदलने की कोशिश की। पर श्रीमती जी कहाँ टलने वाली थीं? मेरी चाय और अख़बार की आदत छूटी तो उन्होंने पकड़ ली थी। अखबार में शायद उन्होंने भी उक्त महानुभाव के आउटहाऊस में करोड़ों के जलते कुबेरधन की ख़बर पढ़ ली थी।
पर घुमा-फिरा कर बात करने की उनकी पुरानी आदत है। बोलीं, “ये सीज़र की पत्नी और उसपर उठने वाले संदेह का क्या मतलब है जी?” मैंने कहा कि ना तो वे सीज़र की पत्नी हैं ना ही कभी उनपर कोई संदेह का कारण बनता है, तो यह प्रश्न क्यों। श्रीमती जी तुनक गईं - बोलीं मेरे ऊपर संदेह करने वाले का मुँह ना नोच लूँ मैं? मैं तो सीज़र की बात कर रही हूँ। तुम कौन से बड़े जूलियस सीज़र बने बैठे हो? आम आदमी हो, आम आदमी की तरह ही रहो। तुम्हारी हरकतों पर मुझे शक हो रहा है। आठ बजे तक पलंग तोड़ने और फिर आरामकुर्सी पर धँसा रहने वाला रोज़ मुँह-अँधेरे टहलने कैसे लगा?
मैंने स्वीकारोक्ति में भलाई समझी, और बता ही डाला कि मैं इस उम्मीद में घूमता हूँ कि कोई भलामानस कभी हमारे आउटहाऊस में भी नोटों की बोरियाँ डाल जाये तो मैं झट उठा लाऊँ। यह भी डर था कि मेरा पीए या ड्राईवर कहीं ग़लतफ़हमी में, या मेरे प्रति निष्ठा में, नोट जला ना डालें ताकि सबूत नष्ट हो जाएँ और उनके साहब बेदाग़ बच रहें। उन्हें भी तो रोकना होगा। धर्मपत्नी बोलीं कि अव्वल तो कोई भलामानस नोटों की बोरियाँ नहीं बाँटता फिरता, और दूसरे तुम्हारे ऐसे कोई करतब भी तो नहीं कि कोई तुम पर रुपयों की भेंट चढ़ाए।
पर मैं नहीं माना, और अपना प्रात:क़ालीन भ्रमण करता ही रहा। चार महीनों में मेरा वज़न आठ किलो घट गया, अंग-अंग में फुर्ती आ गई, भूख खुलकर लगने लगी। खोजी नज़र वाले मॉर्निंग वॉक से लौटकर अब मैं ही चाय बनाता और बाग में कुर्सियाँ डालकर धर्मपत्नी को चाय पर आमंत्रित करता। श्रीमती जी चकित होकर मुस्कराती-इठलाती इस बदलाव का ख़ूब आनंद ले रही थीं। मन करता छलाँग मारकर चाँद पर पहुँच जाऊँ। एक दिन अचानक मैं श्रीमती जी से बोल पड़ा कि चलो कहीं पहाड़ों की सैर कर आएँ, तुम कई सालों से कह भी तो रही थीं। बच्चे बड़े हो गये और इधर-उधर निकल गये, और हम लोग कामकाज में और गृहस्थी में ही फँसे रह गये।
श्रीमती जी भौंचक्की रह गईं। जाकर चाय बनी लाईं। बग़ल में बैठकर मुस्कुराकर बोलीं - इन चार महीनों में तुम्हें ना जाने क्या मिला, पर मुझे तो मेरे नोटों की बोरी मिल गई। इन्हें तो कोई जला भी नहीं सकता। फिर मेरे कंधे पर सिर रख दिया और हौले से बोलीं - मेरा जूलियस सीज़र! मैंने ठुड्डी पकड़कर उनका सिर उठाया तो देखा दोनों आँखों में मोती ढलक आये थे।
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